10/09/2006

पाँच मुक्तक .... तुम्हारे लिये

१.
प्रणय की प्रेरणा तुम हो
विरह की वेदना तुम हो
निगाहों में तुम्ही तुम हो
समय की चेतना तुम हो ।

२.
तृप्ति का अहसास तुम हो
बिन बुझी सी प्यास तुम हो
मौत से अब डर नहीं है
ज़िन्दगी की आस तुम हो ।

३.
सपनों का अध्याय तुम्ही हो
फ़ूलों का पर्याय तुम्ही हो
एक पंक्ति में अगर कहूँ तो
जीवन का अभिप्राय तुम्ही हो ।

४.
सुख दुख की हर आशा तुम हो
चुम्बन की अभिलाशा तुम हो
मौत के आगे जाने क्या हो
जीवन की परिभाषा तुम हो ।

५.
ज़िन्दगी को अर्थ दे दो
इक नया सन्दर्भ दे दो
दूर कब तक यूँ रहोगी
नेह का सम्पर्क दे दो ।

8 comments:

Anonymous said...

कूछ कहना हैं कह कर काफी कूछ कह लिया हैं आपने.
वैसे हम भी कविता पर कवितामय टिप्पणी देते रहे है.
निंदो में सपने तुम हो,
परायों में अपने तुम हो.
किसीसे कूछ नहीं कहते अब,
हर कहने में तुम हो.

गिरिराज जोशी said...

एक सवाल.... पाँच मुक्तक

१.
प्रणय की प्रेरणा कौन है?
विरह की वेदना कौन है?
निगाहों में बसी वो सुन्दरी
समय की चेतना कौन है?

२.
तृप्ति का अहसास कौन है?
बिन बुझी सी प्यास कौन है?
मिटा गई जो भय मौत का
ज़िन्दगी की आस कौन है?

३.
सपनों का अध्याय कौन है?
फ़ूलों का पर्याय कौन है?
लिखने को "मजबूर" करे वो
जीवन का अभिप्राय कौन है?

४.
सुख दुख की हर आशा कौन है?
चुम्बन की अभिलाशा कौन है?
मौत भी है भयभीत जिनसे
जीवन की परिभाषा कौन है?

५.
ज़िन्दगी को जो अर्थ दे रही
इक नया जो सन्दर्भ दे रही
जल्द पंहूचेगी आपके आंगन
वो भी तो व्याकुल हो रही ।

- आपके मुक्तकों का पोस्टमार्टम करने के लिए क्षमा प्रार्थी -

Sagar Chand Nahar said...

बहुत सुन्दर रचना जी,
कविराज के प्र्श्नों का उत्तर मिलेगा क्या?

राकेश खंडेलवाल said...

तुम मेरे अहसास की पगडंडियों पर पांव रखतीं
चूनरी में बांध पुरबा के झकोरों को विचरतीं
तो सहज अनुभूतियों की कोख का वरदान पाकर
सैकड़ों आकांक्षायें गीत के तन पर संवरती

बहुत अनूठे मुक्तक हैं अनूपजी

Udan Tashtari said...

बहुत खुबसूरत मुक्तक मोतियों की माला सजाई है.

Anonymous said...

मेरा कहना तुच्छ होगा, पर मन में आये भाव को रोक नहीं सकी । आपने बहुत अच्छा लिखा है आपको और आपके 'तुम' को भी बहुत -बहुत बधाई। जिनके लिये आपके मन में इतने सुन्दर भाव हैं।

आती हुई बहार तुम्हीं हो
सावन की फुहार तुम्ही हो
मेरे मन के वन उपवन में
मीठी सी झंकार तुम्ही हो।

डॉ० भावना कुअँर

अनूप भार्गव said...

सँजय जी, गिरिराज जी, सागर जी, राकेश जी, भावना जी, समीर भाई:
बहुत बहुत धन्यवाद कि आप नें इन मुक्तकों को पसन्द किया।

गिरिराज जी:
आप नें जितनें लम्बें सवाल पूछे हैं उतनें तो अब तक किसी इम्तहान में भी नहीं पूछे गये । हाँ इतनें सारे 'कौन है" वाले सवाल सुन कर 'निदा फ़ाज़ली' साहब का एक दोहा याद आ गया जो मुझे बहुत पसन्द है :
मैं क्या जानूँ तू बता , तू है मेरा कौन
मेरे मन की बात को जाने तेरा मौन ।

राकेश जी:
आप का मुक्तक हमेशा की तरह अनूठी उपमाएं लिये है ।
भावना जी:
आप का मुक्तक इसी कड़ी को खूबसूरती से आगे बढाता है।

अनूप

डॅा. व्योम said...

अनूप जी बहुत सुन्दर या यों कहें कि मखमली मुक्तक हैं। ..... डॉ॰ व्योम